Sunday, March 22

लहरों से लड़ती कश्ती


मंज़िलें दूर हैं और रास्ता अनजान है, 
पर मेरे सीने में भी एक ज़िद का तूफ़ान है। 
लहरें डराएंगी, 
हवाएँ रुख बदलेंगी, 
मगर मेरी कश्ती का भी अपना ही स्वाभिमान है।

अंधेरा घना है तो क्या, 
चिराग़ जलाना सीख लिया, 
काँटों भरी राहों पर मुस्कुराकर चलना सीख लिया। गिरना बुरा नहीं, 
गिरकर न उठना खता है, 
मैंने हर ठोकर से गिरकर सँभलना सीख लिया।

वक्त की स्याही से अपनी तकदीर खुद लिखूँगा, 
मैं वो नहीं जो हालातों के आगे झुकूँगा। 
परों में उड़ान है और हौसलों में जान, 
जब तक साँस है, 
मैं बस मंज़िल की ओर दिखूँगा।

सूरज भी ढलता है, 
फिर से निकलने के लिए, 
रात भी होती है, 
सवेरे में बदलने के लिए। 
तू बस चल मुसाफ़िर, 
रुकना तेरा काम नहीं, 
पाँव बने हैं सिर्फ़ ऊँचाइयों पर चढ़ने के लिए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...