वक्त के थपेड़ों ने,
रंग ढंग बदल दिए,
देखते ही देखते,
अपनों ने भी अपनों को बदल दिए।
कभी जो साथ चलते थे,
एक साया बनकर हरदम,
आज वही अजनबी बनकर,
राहें बदल दिए।
इंसान की फितरत भी,
मौसम सी बदलती है,
तारीफों की गर्मी में,
नफरत भी पिघलती है।
ज़रूरत खत्म होते ही,
सब अहसास बदल जाते हैं,
जो कल तक थे मरहम,
आज वही ज़ख्म बदल जाते हैं।
न जाने कैसा ये खेल है,
जो हर बार बदलता है,
एक चेहरा मुखौटा ओढ़े,
बार-बार बदलता है।
दिखने में वही इंसान,
पर सोच में कोसों दूर,
देखकर ये बदलाव,
दिल खुद से ही बदलता है।
पर शायद यही जीवन है,
यही कुदरत का कानून,
जो रुक गया वो ठहर गया,
जो बदला वो ही जुनून।
बदलाव से डरना कैसा,
ये तो वक़्त की ज़रूरत है,
पर जो अंदर से न बदले,
वही सच्ची इंसानियत है।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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