एक अनजान सफ़र है, एक अनजानी सी डगर है,
ना मंज़िल का पता कोई, ना रुकने का असर है।
कभी ये राह हँसती है, कभी आँसू बहाती है,
कभी यादों की बारिश में हमें भीगना पड़ता है।
कभी हम साथ चलते हैं, कभी तन्हा भी होते हैं,
कभी सपनों की गलियों में नए चेहरे भी मिलते हैं।
कभी कोई मुसाफ़िर बन अचानक पास आता है,
कभी अपना ही साया भी हमें पहचान जाता है।
कभी उम्मीद जगती है, कभी दिल टूट जाता है,
कभी छोटा सा सपना भी बहुत कुछ छीन जाता है।
कभी थक कर ये दिल भी रास्तों से रूठ जाता है,
कभी एक मुस्कान ही फिर से सफ़र बन जाती है।
कभी मौसम बदलता है, कभी हालात बदलते हैं,
कभी हम ही बदलते हैं, कभी जज़्बात बदलते हैं।
कभी कोई कहानी रास्तों में मिल ही जाती है,
कभी एक खामोशी ही ग़ज़ल सी बन के गाती है।
कभी दिल पूछता हमसे ये कैसा कारवाँ चल पड़ा,
कभी लगता है जैसे कोई सपना सच हुआ।
कभी खोते हैं कुछ अपने, कभी कुछ पा भी लेते हैं,
कभी अजनबी राहों को भी घर सा मान लेते हैं।
कभी रातें सिखाती हैं अंधेरों से गुज़र जाना,
कभी सूरज बताता है नए दिन को संवर जाना।
कभी यादों की खुशबू भी हमें रुला ही देती है,
कभी बचपन की कोई बात हँसा भी ही देती है।
कभी मंज़िल नज़र आती है फिर ओझल भी हो जाती,
कभी छोटी सी कोशिश भी बड़ी ताकत दिखाती।
कभी दिल हार जाता है, कभी फिर जीत जाता है,
कभी ये ज़िंदगी खुद ही हमें जीना सिखाती है।
कभी लगता है जैसे हम कहानी बन गए कोई,
कभी लगता है जैसे बस मुसाफ़िर ही रहे हम।
ये दुनिया एक मेला है, ये रिश्तों का समंदर है,
कभी इसमें किनारा है, कभी बस इक भंवर है।
मगर फिर भी ये दिल हर रोज़ चलना चाहता है,
ये अनजान सा सफ़र भी अपना लगने लगता है।
न मंज़िल की शिकायत है, न रस्तों से गिला कोई,
बस चलते रहना ही अब जिंदगी का सिलसिला है।
ये अनजान सा सफ़र है, यही जीवन का असर है,
कभी हँसी की धूप है, कभी यादों की लहर है।
लेखक:-वैभव कुमार सेजवार
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