Sunday, March 22

खामोशी या कुछ और

उम्र भर की खामोशी
चंद लम्हों के लहज़े 
जिनको जो तोड़ना सो तोड़ गए।

उनको जाना था
बस इक बहाना था
छोड़ना तय था सो छोड़ गए।

कुतर गए पंख अरमानों के
लहज़े तल्ख़ बा-जुबानों के,
सीने पर आरी चलनी थी
आग यहीं तो जलनी थी;

चिंगारी एक अनाड़ी थी
दुःख की क्या व्यापारी थी?
गमनीन आंसुओं के बहते
और किनारे कुछ न कहते;

बहने को धारा तैयार
आंसू निकले हो बेकरार
कई कई किनारे मोड़ गए

उम्र भर की खामोशी
चंद लम्हों के लहज़े 
जिनको जो तोड़ना सो तोड़ गए।

जादू तो एक छलावा है
झूठा है बहलावा है!
इश्क भी एक जादू जानो
और छलावे सच न मानो;

होगी राह और मुकम्मल 
जिनपे चलें शायद कल
आज की रात तूफानी है
आंखों में सैलाब का पानी है।

लहज़े में इतनी तल्ख़ियत क्यों 
हम बुरे हो गए अचानक यूं?
ये किस्सा एक पुराना है
अब तो नया जमाना है!

ये नई धार कहती है बहो 
ग़म की बाहें थाम चलते रहो
जिंदगी एक नई बनानी है
अपनी कहानी सुनानी है!


इतनी बातों के मतलब में
मतलब बिन किसी मतलब के
मतलबी होने का नकाब ओढ़ गए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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