थकी आँखों में सपनों का, हसीं मंजर ज़रूरी है,
समंदर फतह करने को, मगर लंगर ज़रूरी है।
बिना मेहनत के हाथों में, कभी शोहरत नहीं आती,
हथेली पर अगर फल हो, तो फिर शजर ज़रूरी है।
बुलंदी पर जो पहुँचे हैं, वो रातों को न सोये थे,
सफलता के बगीचे में, उन्होंने बीज बोये थे।
ज़माना ढूँढता है बस, चमकते चाँद को हरदम,
मगर वे जानते हैं सच, जो कीचड़ में भी खोये थे।
पसीने की हर इक बूँद, कहानी खुद सुनाएगी,
तुम्हारी आज की ये चुप, कल शोर मचाएगी।
डरो मत तुम अंधेरों से, बस अपना काम करते चल,
सुबह की पहली जो किरण है, वो तुमको ही बुलाएगी।
सितारे टूटते हैं तो, फलक रोया नहीं करता,
जो खोता है वही अक्सर, नया कुछ पाया करता।
मशक्कत की सड़कों पर, खड़ा है जो निडर होकर,
मुकद्दर भी उसी के सामने, सर को झुकाया करता।
लेखक:-वैभव कुमार सेजवार
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