Sunday, March 22

कागज़ की कश्ती


वो छत पे चढ़कर पतंग उड़ाना, 
वो सहेलियों के संग गुड़िया सजाना। 
नफ़रत का कहीं कोई नाम न था, 
बस रूठना और फिर मान जाना।

कहाँ गए वो बेफिक्री के दिन, 
जब शामें गुज़रती थीं खेल-कूद के बिन। 
अब तो बस घड़ियों का पहरा है, 
बचपन का वो अक्स बहुत गहरा है।

काश! फिर से वो कागज़ की कश्ती मिल जाए, 
वो सावन की पहली मस्ती मिल जाए। 
दौड़ कर पकडूँ फिर से वो तितली, 
जो अब यादों के बागों में है सिमटी।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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