Sunday, March 22

"यादों का मुसाफ़िर"

बस का रात वाला सफर 
रात थी गहरी, बस धीरे चल रही थी,
खिड़की से ठंडी हवा दिल छू रही थी।
पीछे छूटता शहर कुछ कहता सा लगा,
जैसे कोई अपना फिर रहता सा लगा।
सीट पर बैठा मैं चुप सा मुसाफ़िर,
साथ थे लोग मगर दिल था तन्हा फिर।
कभी शीशे पर माथा टिक जाता था,
कभी कोई पुराना चेहरा दिख जाता था।
Anand Vihar से चली थी ये राह,
साथ ले आई दिल की हर चाह।
सड़क की लाइटें भागती जाती थीं,
जैसे यादें मुझसे दूर जाती थीं।
कभी लगा तुम पास ही बैठे हो,
खामोशी से कुछ कहते हो,
फिर आँख खुली तो समझ आया —
सफर में लोग होते हैं, अपने नहीं होते।
Bareilly से पहले जब रात गहरी होगी,
नींद भी आँखों से ठहरी होगी,
तब शायद दिल ये समझ जाएगा —
कुछ लोग बस यादों में ही मिलते हैं।
"बरसिया" आएगा तो उतर जाऊँगा मैं,
भीड़ में फिर खो जाऊँगा मैं,
घर तो मिल जाएगा मेरा पर,
पर जो खोया है — वो कहाँ पाऊँगा मैं… 

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial


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