तपती धूप में जलता है जो,
अपनी संतान की खातिर,
वो पिता ही है जो झुकता नहीं,
किसी तूफ़ान की खातिर।
कभी सख्ती दिखाता है,
तो कभी चुपके से रोता है,
हमारी एक मुस्कुराहट में,
वो अपनी थकान खोता है।
हाथ की उन लकीरों में,
संघर्ष की एक कहानी है,
उनकी डाँट में भी छुपी,
ममता की ही निशानी है।
खिलौनों से जो भर देता,
हमारे बचपन की झोली,
खुद फटे पुराने कपड़ों में,
जिसने काटी हर दिवाली।
जब कभी मैं गिरता हूँ,
वो हाथ बढ़ाकर उठाता है,
"बेटा तू शेर है मेरा",
कहकर हौसला बढ़ाता है।
माँ अगर ममता का सागर,
तो पिता उस सागर का किनारा है,
इस मतलबी सी दुनिया में,
वो ही सबसे बड़ा सहारा है।
माँगने से पहले ही जो,
हर ज़िद को पूरी करता है,
वो शख्स खुदा से कम नहीं,
जो हमारी फ़िक्र में मरता है।
उंगली पकड़कर चलना सिखाया,
अब मंज़िल तक जाना है,
पिता का नाम रोशन करना,
बस अब यही एक ठिकाना है।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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