यहाँ यादों का मेला है,
यहाँ खुशियों का घेरा है,
मिले सुकूँ जहाँ दिल को,
यही प्यारा सा डेरा है।
किसी के लिए इमारत है,
किसी के वास्ते मिट्टी,
मगर मेरे लिए सच में,
ये जन्नत का बसेरा है॥
कहीं दीवारों पे हँसी,
कहीं कोनों में बातें हैं,
यहीं पर धूप खिलती है,
यहीं सुहानी रातें हैं।
थकन दुनिया की सारी मैं,
यहीं आकर मिटाता हूँ,
मेरे घर की हवाओं में,
दुआओं की बरसातें हैं॥
बचपन की वो किलकारी,
आँगन में आज भी गुम है,
पिता की डाँट है इसमें,
और माँ का प्यार हरदम है।
ये घर केवल मकाँ नहिं,
मेरी पहचान है दुनिया,
मेरी हर एक धड़कन में,
इसी घर का ही परचम है॥
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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