Sunday, March 22

यादों की चौखट


कभी आँखों में नमी है, 
कभी होठों पे प्यास है, 
कभी खुद से ही दूर हूँ, 
कभी तेरे ही पास हूँ, 
तुझे पाकर भी खोने का,जो डर दिल में समाया है, 
वही तो सच है दुनिया का, 
बाकी सब तो विलास है।

 तुझे पाना मुकद्दर था, 
तुझे खोना हकीकत है, 
ये कैसी कशमकश है दिल, 
ये कैसी आदमियत है, 
कि जिसकी याद में खुद को, 
भुला बैठा है ये पागल, 
उसी को भूल जाने की, 
अब दुनिया देती नसीहत है।

न तुम हो बेवफा जानम,
न हम हैं बेवफा देखो, 
मिले हैं दर्द के साये, 
मिली है हर दफ़ा देखो, 
जो उलझन मेरे दिल की है, 
वही तो तेरे दिल में है, 
मगर ये फासला फिर भी, 
बना है बे-वजह देखो।

कभी बादल सा रोता हूँ, 
कभी बिजली सा गिरता हूँ, 
मैं अपनी ही खताओं से, 
यहाँ हर रोज़ लड़ता हूँ, 
हकीकत जान कर भी मैं, 
तुझे ख़्वाबों में ढूँढूँ क्यों, 
मैं जलती आग के दरिया, 
में ख़ुद ही रोज़ उतरता हूँ।

कभी यादों के जंगल में, 
कोई साया सा दिखता है, 
ये कोरा मन पुरानी सी, 
कोई तहरीर लिखता है, 
मैं जिससे भागता हूँ रोज़, 
वो टकराता है रस्ते में, 
कि तेरा नाम अब मेरी, 
दुआओं में भी बिकता है।

 अधूरे ख्वाब की आँखें, 
बहुत ही नम सी होती हैं, 
वफ़ा की राह में रातें, 
बड़ी बे-दम सी होती हैं, 
जिन्हें मंज़िल समझ कर हम, 
उम्र भर दौड़ते रहते, 
वो गलियां मोड़ पर आकर, 
बहुत ही कम सी होती हैं।

 मोहब्बत एक दरिया है, 
मगर प्यासा ही रखती है, 
ये दिल को बस दिलासे और, 
दिलासा ही रखती है, 
किसी के वास्ते खुद को, 
मिटा देना सलीका है, 
मगर ये रूह को हरदम, 
तमाशा ही रखती है।

 पुराना ज़ख्म है कोई, 
जो अक्सर टीस देता है, 
ये बीता वक्त जाने क्यों, 
नयी ताकीद देता है, 
सफर में हमसफ़र छूटे, 
मगर यादें नहीं छूटतीं, 
कि हर इक मोड़ यादों की, 
हमें रसीद देता है।

कभी यादों की चौखट पर, 
कोई दस्तक सी होती है, 
ये तनहाई की रातें भी, 
बहुत रुसवा सी होती हैं, 
दुआएं माँगता हूँ मैं, 
कि तुझको भूल जाऊँ पर, 
मगर ये प्रार्थनाएँ भी, 
बहुत तन्हाँ सी होती हैं।

कि जैसे रेत मुट्ठी से, 
फिसलती ही चली जाए, 
कि जैसे रात सूरज से, 
बदलती ही चली जाए, 
ये जीवन का सफ़र ऐसा, 
तमाशा बन गया है अब, 
कि जैसे आग पानी में, 
उबलती ही चली जाए।

महोब्बत के झरोखों में, 
कभी झाँका नहीं जाता, 
कि दिल का दर्द लफ़्जों में, 
कभी टाँका नहीं जाता, 
जिन्हें हम जान कहते थे, 
वो अब अनजान बैठे हैं, 
कि अपनी प्यास को मय से, 
कभी आँका नहीं जाता।

नया सूरज निकलता है, 
नयी उम्मीद लाता है, 
मगर ये पिछला सन्नाटा, 
बहुत दिल को दुखाता है, 
मैं लिखना चाहता हूँ अब, 
खुशी के गीत दुनियां को, 
मगर ये कलम का कागज़, 
तेरा ही नाम पाता है।

वफा की सीढ़ियों पर अब, 
कदम रखने से डरते हैं, 
कि हम भी कांच के घर में, 
सनम रहने से डरते हैं, 
किसी की मुस्कुराहट में, 
छिपी जो बेरुखी देखी, 
तभी से हम मुहब्बत को, 
जनम कहने से डरते हैं।

कभी जो गीत लिखते थे, 
वो अब मातम सा लगते हैं, 
ये दुनिया के पुराने लोग, 
अब आदम सा लगते हैं, 
जिन्हें पलकों पे रखा था, 
वो ओझल हो गए ऐसे, 
कि खुद के जख्म भी हमको, 
अब मरहम सा लगते हैं।

न तुमको पा सके अब हम, 
न खुद को खो सके अब तक, 
न हँस कर जी सके अब हम, 
न जी भर रो सके अब तक, 
ये कैसी प्यास जागी है, 
सुलगते रेत के ऊपर, 
कि सपनों के किसी घर को, 
न हम बो सके अब तक।

पुराना आइना कल फिर, 
बड़ी बातें बना बैठा, पुरानी याद की महफिल, 
वो आँखों में सजा बैठा, 
मैं कहना चाहता था कल, 
कि तुम बिन जी नहीं सकते, 
मगर ये दिल का सन्नाटा, 
गवाही दे के जा बैठा।

कभी फुर्सत मिले तो तुम, 
पुराने खत जला देना, 
मगर जो रूह पर लिखे, 
वो किस्से तुम भुला देना, 
सफर में साथ चलने की, 
कसम जिसने भी खायी थी, 
उसी के हाथ में तुम भी, 
कोई पत्थर थमा देना।

अकेलेपन की चादर में, 
सुलगती धूप रहती है, 
ये दुनिया दूर से देखो, 
बड़ी चुप-चाप रहती है, 
जिसे हम मंज़िलें समझे, 
वो महज़ एक छलावा था, 
यहाँ हर शख़्स के दिल में, 
कोई दीवार रहती है।

नज़र का खेल है सारा, 
नज़र ही वार करती है, 
वही जो प्यार देती है, 
वही लाचार करती है, 
मैं हँस कर टाल देता हूँ, 
ज़माने के हर एक ताने, 
मगर ये बेबसी दिल की, 
बड़ा बीमार करती है।

पुराना सिलसिला कोई, 
नया सा दर्द देता है, 
ये यादों का परिंदा क्यों, 
हमें आवाज़ देता है, 
मैं मुड़कर देखूँ पीछे तो, 
खंडर ही अब दिखते हैं, 
मगर ये वक्त जाने क्यों, 
नयी परवाज़ देता है।

कि जैसे प्यास का रिश्ता, 
किसी झोंके से होता है, 
कि जैसे दर्द का रिश्ता, 
किसी धोखे से होता है, 
मैं जिसको ढूँढता फिरता, 
यहाँ हर एक महफ़िल में, 
वो मेरा सामना अक्सर, 
बस इक मौके से होता है।

अंधेरी रात के साये, 
डराते हैं तो डरने दो, 
पुरानी याद के नगमे, 
रुलाते हैं तो रोने दो, 
कि जिसने उम्र भर हमको, 
सिवा तन्हाई के कुछ न दिया, 
उसे अब ख्वाब की दुनिया, 
बसाते हैं तो बसने दो।

न तुम अपनी जगह कम हो, 
न हम अपनी जगह कम हैं, 
कि दोनों एक ही दरिया, 
के गहरे से दो संगम हैं, 
मगर ये फासला फिर भी, 
बना है रूह के अंदर, 
कि जैसे एक ही सुर के, 
अधूरे से दो सरगम हैं।

कलम उठती है जब दिल की, 
गवाही पेश करने को, 
तैयार हूँ मैं अपनी, 
हर तबाही पेश करने को, 
मगर ये वक्त का पहिया, 
रुका है आज भी वहीं, 
जहाँ आया था मैं खुद की, 
सियाही पेश करने को।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

No comments:

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...