Sunday, March 22

कुछ बातें कुछ सवाल


न ऊँचे महल माँगिये, 
न दुनिया की मिसाल बनिये, 
मिट्टी के पुतले हैं हम, 
बस इंसानियत की मिसाल बनिये...

न शिकवा ज़माने से कीजिये, 
न गिला तक़दीर से कीजिये, 
जो पास है उसमें खुश रहिये, 
बस शुक्र का दामन थाम लीजिये...

न दौड़ में शामिल रहिये, 
न किसी से होड़ रखिये, 
ज़िन्दगी एक खूबसूरत सफर है, 
बस सहजता से चल दीजिये...

न कल की फिक्र में डूबिये, 
न बीते कल को याद कीजिये, 
साँसें जो मिली हैं आज, 
बस खुलकर इन्हें जी लीजिये...

न चादर बड़ी कीजिये, 
न ख्वाहिशें दफन कीजिये, 
चार दिन की ज़िन्दगी है, 
बस चैन से बसर कीजिये...

न परेशान किसी को कीजिये, 
न हैरान किसी को कीजिये, 
कोई लाख गलत भी बोले, 
बस मुस्कुरा कर छोड़ दीजिये...

न रूठा किसी से कीजिये, 
न झूठा वादा किसी से कीजिये, 
कुछ फुरसत के पल निकालिये, 
कभी खुद से भी मिला कीजिये..

रिश्तों की मिठास

न ऊँची आवाज़ रखिये, 
न दिल में कोई राज़ रखिये, 
ज़िन्दगी छोटी सी है, 
बस प्यार का अंदाज़ रखिये...

न कमियाँ किसी की देखिये, 
न खूबियाँ अपनी गिनाइये, 
आईना हैं हम एक दूजे का, 
बस मुस्कुरा कर गले लगाइये...

न मतलब से हाथ मिलाइये, 
न स्वार्थ से रिश्ता निभाइये, 
मिले जो कोई राह में, 
बस अपनों सा साथ निभाइये...

न दुनिया की भीड़ में खोइये, 
न तन्हाई में रोइये, 
ज़िन्दगी एक दुआ है, 
बस हर पल इसमें खुश रहिये...
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सादगी की राह

न दूसरों से उम्मीद रखिये, 
न खुद को कम समझिये, 
दिल में सबके लिए प्यार, 
और लबों पर मुस्कान रखिये...

न ऊँची उड़ानों का गुमान कीजिये, 
न ज़मीं से नाता तोड़िये, 
वक्त तो बस मुसाफिर है, 
हर लम्हें को शिद्दत से जी लीजिये...

न कल की चिंता में आज खोइये, 
न बीते दुखों में दिल डुबोइये, 
खूबसूरत है ये कायनात, 
बस नज़रिया थोड़ा सा बदल लीजिये...

न शिकायतें हज़ारों रखिये, 
न नफ़रत के बीज बोइये, 
छोटी सी है ये ज़िन्दगी, 
बस प्यार बाँटते हुए चल दीजिये...
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मन के कुछ सवाल

न जाने क्यों हम दौड़ रहे हैं, 
किस मंज़िल की तलाश में?

क्या सुकून छिपा है तिजोरियों में, 
या खुले आसमान के पास में?

न जाने क्यों हम रूठ जाते हैं, 
अपनों की छोटी बातों पर?

क्या साथ रहेगा ये गुरूर हमारा, 
जब सितारे हँसेंगे रातों पर?

न जाने क्यों हम कल की फिक्र में, 
आज का चैन गँवाते हैं?

जो लम्हा अभी है मुट्ठी में, 
उसे क्यों यूँ ही जाने देते हैं?

न जाने क्यों हम दूसरों में, 
बस कमियाँ ही ढूंढ पाते हैं?

क्या कभी झाँका है रूह के अंदर, 
हम खुद को कितना जानते हैं?
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बदलाव का सफर

न हवाओं को कोसिये, 
न वक्त से यूँ उलझिये, 
बदलना ही दस्तूर है, 
बस वक्त के संग चलिये...

न मंज़िल की फिक्र में, 
रास्तों को भुलाइये, 
सफर ही असली मंज़िल है, 
बस कदम से कदम मिलाइये...

न दूसरों की चमक देख, 
अपनी रौशनी कम कीजिये, 
आप भी एक सूरज हैं, 
बस खुद पर यकीं कीजिये...

न बंद मुट्ठी में रेत को, 
रोकने की कोशिश कीजिये, 
जो छूट रहा है उसे जाने दें, 
बस नये लम्हों को जी लीजिये...
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भीतर का शोर

न बाहर शोर कीजिये, 
न खुद से जंग लड़िये,

जो अनकहा है भीतर, 
उसे खामोशी से पढ़िये...

न दूसरों की भीड़ में, 
अपनी पहचान खोइये,

खुद के साथ भी कभी, 
तन्हाई में होइये...

न जीत का अहंकार हो, 
न हार का मलाल हो,

ज़िन्दगी ऐसी जिये, 
कि न कोई सवाल हो...

न उम्र की लकीरों से, 
हौसलों को नापिये,

हर दिन एक नया जन्म है, 
बस मुस्कुरा कर जागिये...
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दसवाँ हिस्सा (सुकून का दान)

न सारा अपना समझिये, 
न मुट्ठी बंद रखिये,

खुशियों का दसवाँ हिस्सा, 
औरों के नाम लिखिये...

न ऊँचे ओहदे का मान हो, 
न दौलत का गुमान हो,

बाँट सको जो रोटी अपनी, 
तो तुम भी भगवान हो...

न दुआओं की गिनती कीजिये, 
न एहसान कभी गिनाइये,

दिये से जला कर दिया, 
बस अँधेरा दूर भगाइये...

न संचय की लगी हो होड़, 
न कल की कोई फिक्र हो,

ज़िन्दगी वही मुकम्मल है, 
जिसमें सबका ज़िक्र हो...
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जुबां की मिठास

न कड़वे बोल बोलिए, 
न दिल किसी का तोड़िए,

शहद जैसी जुबां रखिए, 
बस प्यार सबसे जोड़िए...

न ऊँची बात कीजिए, 
न नीचा किसी को दिखाइए,

छोटा हो या बड़ा कोई, 
बस अदब से सिर झुकाइए...

न बहस में वक्त खोइए, 
न खुद को सही साबित कीजिए,

जहाँ कद्र न हो अल्फाजों की, 
वहाँ खामोशी चुन लीजिए...

न नफरतों को पालिए, 
न दिल में कोई मैल रखिए,

दुनिया एक मुसाफिरखाना है, 
बस सबसे मेल रखिए...
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बड़प्पन की पहचान

न औकात किसी की नापिये, 
न रसूख अपना दिखाइये,

मिलना हो अगर किसी से, 
तो इंसानियत साथ लाइये...

न झुकने को कमजोरी समझिये, 
न अकड़ को शान कहिये,

जो दरिया बन कर बह सके, 
उसे ही इंसान कहिये...

न गलत का साथ दीजिये, 
न हक किसी का मारिये,

गर जीतना है दिल यहाँ, 
तो खुद को थोड़ा हारिये...

न दिखावे की इबादत हो, 
न दिखावे की कोई रीत हो,

ज़िन्दगी वही खूबसूरत है, 
जहाँ रूह में सिर्फ संगीत हो...
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ज़िन्दगी का फलसफा (एक लंबी कविता)

न महलों की चाहत रखिये, 
न तख्तों का गुमान कीजिये, 
मिट्टी के खिलौने हैं सब, 
बस इंसानियत का मान कीजिये...

न शिकवे ज़माने से रखिये, 
न किस्मत को कोसा कीजिये, 
जो मिल गया वही नेमत है, 
बस शुक्र में जिया कीजिये...

न कल की फिक्र में आज खोइये, 
न बीते वक्त पर रोइये, 
साँसों की पूंजी मिली है जो, 
उसे खुलकर आज जी लीजिये...

न ऊँची आवाज़ में बोलिए, 
न दिल किसी का तोड़िए, 
मिठास घोलिए बातों में, 
बस प्यार से सबको जोड़िए...

न रसूख की नुमाइश कीजिये, 
न औकात किसी की नापिये, 
रिश्तों में गर गर्माहट हो, 
तो हर लम्हे को सुकून से मापिये...

न नफरतों के बीज बोइये, 
न ईर्ष्या की आग में जलिये, 
दुआओं का काफिला साथ हो, 
बस ऐसी राह पर चलिये...

न दूसरों की चमक देखिये, 
न खुद को कम आँखिये, 
आप भी एक आफताब हैं, 
बस अपनी रौशनी को पहचानिये...

न मतलब के हाथ मिलाइये, 
न स्वार्थ के रिश्ते पालिये, 
निस्वार्थ भाव से जो मिले, 
उसे पलकों पर सजा लीजिये...

न भीड़ में अपनी पहचान खोइये, 
न तन्हाई से घबराइये, 
खुद के साथ भी वक़्त बिताकर, 
कभी खुद से भी मिल आइये...

न जीत का अहंकार हो, 
न हार का मलाल हो, 
ज़िन्दगी ऐसी बसर कीजिये, 
कि दिल में न कोई सवाल हो...

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...