इश्क तो महज़ लफ़्ज़ नहीं,
रूह की इबादत है,
तुम्हारे आने से शुरू,
जो वो पुरानी सादत है।
ढूँढता था जिसे मैं भीड़ की उन गलियों में अक्सर,
तुम मिले तो लगा,
जैसे मिली मुझे खुद की ही मलकियत है।
सुबह की पहली किरण,
जब तुम्हारी आँखों में ठहरती है,
लगता है जैसे पूरी कायनात,
वहीं आके संवरती है।
तुम बात करो तो जैसे फूलों की बारिश हो जाए,
तुम्हारी हर एक सादगी,
मेरी रूह में उतरती है।
वक्त के इस बहाव में,
हम कितने दूर निकल आए,
मगर यादें तुम्हारी हैं,
जो हर राह में साथ निभाए।
तुम हँसते हो तो जैसे सारा जहाँ जगमगा उठता है,
तुम रोते हो तो सावन के बादल,
आँखों में उतर आए।
ज़माना कहता है इश्क,
महज़ एक हसीन छलावा है,
मगर मुझे तो ये,
खुदा का सबसे बड़ा बुलावा है।
तुमसे शुरू होके,
तुमपे ही खत्म होती है मेरी दुनिया,
तुम्हारे इश्क में डूबा,
मेरा हर एक पल सुहाना है।
दूरी की इन दीवारों को,
हमने कब का गिरा दिया,
तुम्हारी यादों के चिराग को,
दिल में सदा जला दिया।
अब न कोई शिकायत है,
न कोई तड़प है बाकी,
बस एक तेरा साथ पाकर,
मैंने खुद को मुकम्मल पा लिया।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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